लोकतंत्र, संविधान और दलित साहित्य

जनवादी लेखक संघ केंद्र  29-30 मार्च 2025 को एक राष्ट्रीय दलित परिसंवाद आयोजित कर रहा है जिसमें दलित अध्ययन और साहित्य-सृजन से जुड़े, अनेक भारतीय भाषाओं के अध्येता-लेखक शामिल होंगे। अगर दलित प्रश्न में आपकी सामान्य रूप से दिलचस्पी हो या आपके शोध और अध्ययन का विषय इससे ताल्लुक़ रखता हो तो यह परिसंवाद आपके लिए बहुत उपयोगी होगा। ये तिथियाँ सुरक्षित कर लें। आपकी सक्रिय भागीदारी हमारे लिए बहुत मूल्यवान होगी।

कार्यक्रम इस प्रकार है:

लोकतंत्र, संविधान और दलित साहित्य

29-30 मार्च 2025

लेक्चर हॉल, हरकिशन सिंह सुरजीत भवन

पहला दिन (29/03/25)

सुबह 10 बजे

उद्घाटन भाषण : बैजवाड़ा विल्सन 

पहला सत्र : सुबह 11 बजे

कल्याणी ठाकुर

ब्रॉती बिस्वास

कवितेंद्र इंदु

भोजन : 1-2 बजे 

दूसरा सत्र : अपराह्न 2 बजे

बलबीर माधोपुरी

मदन वीरा

प्रवाकर पलाका

कविता पाठ : 4-6 बजे

संयोजन : टेकचन्द

दूसरा दिन (30/03/25)

तीसरा सत्र : सुबह 11 बजे

प्रो. जी जे वी प्रसाद

प्रो. राजकुमार

प्रो. बी मंगलम

भोजन : 1-2 बजे

 चौथा सत्र : अपराह्न 2 बजे

श्री जगदीश पंकज

रतन लाल

रामायन राम 

समापन वक्तव्य : चंचल चौहान

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यह परिसंवाद क्यों?

लोकतंत्र से इतर शासन प्रणालियों के लिए संविधान की अनिवार्यता नहीं होती। वहाँ या तो राजा की मर्ज़ी चलती है या बलशाली की इच्छा। शासन-पद्धति को लेकर तमाम प्रयोग करते हुए मनुष्य लोकतंत्र तक पहुँचा है। अधिकांश देशों ने साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद से जूझते हुए लोकतंत्र को हासिल किया है। भारत की स्थिति थोड़ी जटिल रही है। यहाँ की वर्णवादी-जातिवादी समाज-संरचना लोकतंत्र प्राप्ति के मार्ग में बहुत बड़ी बाधा रही है। यह बाधा आज भी उपस्थित है। राजनीतिक लोकतंत्र सामाजिक लोकतंत्र के अभाव को छिपाने के काम आता है। डॉ. आंबेडकर ने चेतावनी दी थी कि यदि सामाजिक लोकतंत्र सुनिश्चित नहीं किया गया तो लोकतंत्र अर्थहीन हो जाएगा। सामाजिक लोकतंत्र सामाजिक न्याय के ज़रिए आकार लेता है। राष्ट्रीय परिसंपत्तियों को निजी हाथों में सौंपने वाली विचारधारा लोकतंत्र को नष्ट करती है। अगर यह विचारधारा सत्तासीन हो जाए तो इतने बलिदानों के बाद मिला लोकतंत्र और संविधान का अस्तित्व ही ख़तरे में पड़ जाता है। जनवादी लेखक संघ हमेशा लोकतंत्र और संविधान की मज़बूती के लिए संघर्ष करता रहा है। वर्ण-जाति संरचना का उन्मूलन उसका प्रमुख सरोकार है।

फुले-आंबेडकर के चिंतन को आधार बनाकर रचा जाने वाला दलित साहित्य सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना के उद्देश्य से अभिप्रेरित है। उसे दलित पैंथर की मज़बूत वैचारिक और आंदोलनात्मक विरासत प्राप्त है। वह समकाल में संविधान पर छाए गंभीर ख़तरों को पहचानता है और लोकतंत्र की बहाली का इरादा रखता है। निजीकरण करने वाली सत्ता से जूझना उसके लिए लाज़मी है। आज जब सामाजिक हिंसा में उछाल देखने को मिल रहा है और सरकार इसे रोकने के मामले में भरपूर लापरवाही बरत रही है, उसकी चिंताएं गहरा गई हैं। वह अपनी भाषा, तेवर और रणनीति में तब्दीली कर रहा है।

प्रस्तावित संगोष्ठी विविध भारतीय भाषाओं में लिखे जा रहे दलित साहित्य की साम्प्रतिक स्थिति पर विचार करने तथा संविधान, लोकतंत्र को अर्थहीन बनाने के लिए चल रहे कुत्सित अभियानों को समझने व उन्हें रोकने पर मंथन करने के उद्देश्य से आयोजित की जा रही है। इसमें आपकी भागीदारी संगोष्ठी की सार्थकता में बढ़ोत्तरी करेगी। 

 


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