महाभारत के अध्येता और विशेषज्ञ, बंगाली लेखक समीन अहमद के ख़िलाफ़ हिंसक सांप्रदायिक अभियान चलानेवालों पर कड़ी कार्रवाई हो
नयी दिल्ली : 8 सितंबर : सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के उद्देश्य से हिंदुत्ववादी ताक़तें जिन कारगुज़ारियों में मुब्तिला रहती हैं, उन्हीं में एक है, बहाने ढूंढ़कर किसी लेखक के ख़िलाफ़ हिंसक अभियान खड़ा करना। हाल के वर्षों में पेरूमल मुरुगन, एस हरीश और इनकी तरह के अनेक मामले सामने आये हैं। इसी कड़ी में अब पश्चिम बंगाल में समीन अहमद को निशाने पर लिया गया है। जन्माष्टमी के अवसर पर बंगाली अख़बार आनंद बाज़ार पत्रिका के रविवारीय अंक में कृष्ण पर उनका एक लेख शाया हुआ, ‘तिनि राष्ट्र, तिनि महाभारत’। इसमें किसी असावधानी के कारण महाभारत को लेकर यह ग़लत सूचना छप गयी कि जरासंध कंस का दामाद था, जबकि महाभारत की कथा में कंस को जरासंध का दामाद बताया गया है। यह ध्यान देने की बात है कि समीन अहमद महाभारत के बहुत उत्कृष्ट अध्येता और विशेषज्ञ हैं। 2014 में प्रकाशित उनकी किताब महाभारतेर गुप्त हत्या में जरासंध की मृत्यु पर एक पूरा लेख है जिसकी शुरुआत ही इस सूचना से होती है कि कंस जरासंध का दामाद था और कंस की विधवा अस्ति ने अपने पिता से विनती की थी कि वे कृष्ण से कंस की हत्या का बदला लें। ऐसे लेखक का 2018 में छपा लेख अगर ठीक उल्टी सूचना देता है तो निश्चित रूप से यह किसी असावधानी की वजह से हुआ होगा। वह लेखन में हुई असावधानी भी हो सकती है और प्रकाशन की प्रक्रिया के दौरान बरती गयी लापरवाही भी हो सकती है।
लेकिन, हिंदुत्व का नारा बुलंद करनेवालों के लिए यह भूल किसी असावधानी का परिणाम नहीं, लेखक की सोची-समझी चाल है। चूंकि लेखक का नाम उसके मुसलमान होने का सबूत है, इसलिए इस भूल को कृष्ण का अपमान करने की साज़िश बताया गया और सोशल मीडिया पर समीन अहमद के ख़िलाफ़ ज़बरदस्त अभियान छेड़ दिया गया। उन्हें महाभारत पर लिखना बंद करने के लिए धमकियां दी जा रही हैं, उनका सर क़लम करने का आह्वान किया जा रहा है, ‘जय श्री कृष्ण’ के नारे लगाते हुए सार्वजनिक रूप से लेख की प्रतियां जलायी जा रही हैं और इनमें विश्वविद्यालयों के शिक्षक भी शामिल हैं। जिस तथ्यात्मक भूल का कृष्ण के आदर-अनादर से कोई संबंध नहीं है, वह अचानक उनके पूज्य व्यक्तित्व को ध्वस्त करने की दुरभिसंधि बन गयी है। लेख में छप गयी तथ्यात्मक ग़लती के लिए समीन अहमद ने उसी अख़बार में लिखकर माफ़ी भी मांग ली है, लेकिन उनके ख़िलाफ़ घृणा-अभियान थमा नहीं है और आखिरकार लेखक ने वही संकल्प व्यक्त किया है जो, दरअसल, इस अभियान को चलाने वाले चाहते थे: वे भविष्य में महाभारत पर नहीं लिखेंगे।
जनवादी लेखक संघ इस सांप्रदायिक अभियान की कठोर शब्दों में निंदा करता है। यह हमारी मुश्तरका तहज़ीब के ज़िंदा सबूतों को मिटा देने के इरादे से निर्देशित अभियान है। एक छोटी भूल को पूरी भारतीय संस्कृति का संकट बना देने वाली हिंदुत्ववादी ताक़तों के इरादे समझना मुश्किल नहीं है। हम समीन अहमद के ख़िलाफ़ सार्वजनिक रूप से हिंसा का आह्वान करनेवालों पर सख्त कार्रवाई की मांग करते हैं और पश्चिम बंगाल सरकार से यह उम्मीद करते हैं कि वह लेखक की सुरक्षा के लिए ज़रूरी क़दम उठाते हुए लेखक समुदाय को बेख़ौफ़ होकर लिखने के लिए आश्वस्त करेगी।