स्मृति-शेष श्री विष्णु खरे को सादर नमन

स्मृति-शेष श्री विष्णु खरे को  सादर नमन

नयी दिल्ली  :19 सितंबर :  विष्णु खरे जी का जाना हिंदी की साहित्यिक-बौद्धिक दुनिया के लिए बहुत गहरा आघात है। कई दिनों से दिल्ली के जी बी पंत अस्पताल के गहन चिकित्सा कक्ष में उनके भर्ती होने के कारण उनका निधन उनके सभी चाहनेवालों के लिए बहुत अप्रत्याशित तो न था, पर लगभग आठ दिन पहले उनकी भर्ती अवश्य अप्रत्याशित थी। 11 सितंबर की देर रात किसी वक्त़ उन्हें ब्रेन-हैमरेज हुआ और दिल्ली में अकेले रहने की वजह से तत्काल कोई मदद नहीं मिल पायी। 12 सितंबर को, हैमरेज के कई घंटों बाद, उन्हें अस्पताल में दाख़िल कराया गया जहां दिन बीतने के साथ उनकी हालत और गंभीर होती गयी। उनका मस्तिष्क अस्सी प्रतिशत नाकाम हो गया था और शरीर का बायां हिस्सा लकवाग्रस्त था। आज दिन के साढ़े तीन बजे उन्होंने पंत अस्पताल में ही आख़िरी सांसें लीं।

9 फ़रवरी 1940 को छिंदवाड़ा में जन्मे खरे जी हिंदी के अप्रतिम कवि, अनुवादक और आलोचक थे। ‘एक ग़ैर-ज़रूरी रूमानी समय में’, ‘खुद अपनी आंख से’, ‘सबकी आवाज़ के परदे में’, ‘पिछ्ला बाक़ी’, ‘काल और अवधि के दरम्यान’, ‘लालटेन जलाना’ उनके प्रमुख कविता-संग्रह हैं। उनकी आलोचना-पुस्तक, ‘आलोचना की पहली किताब’, काफ़ी चर्चित रही। लंबे समय वे ‘पायोनियर’ अख़बार में अंग्रेज़ी में सिनेमा पर भी लिखते रहे जिन्हें एक बड़ा पाठक-वर्ग बहुत चाव से पढ़ता था। अनुवाद के क्षेत्र में उनका काम बहुत सराहनीय है। मात्र बीस वर्ष की उम्र में, 1960 में उन्होंने टी एस इलियट की कविताओं का अनुवाद किया जो ‘मरुप्रदेश और अन्य कविताएं’ शीर्षक से प्रकाशित है। फ़िनलैंड का राष्ट्रीय काव्य ‘कालेवाला’, चेस्वाव मिवोश और शिम्बोर्स्का की कविताएं, अत्तिला योज़ेफ़ की कविताएं (‘यह चाकू समय’) और विश्व साहित्य की अन्य अनेक महत्वपूर्ण कृतियां विष्णु खरे के अनुवाद के माध्यम से हिंदी में उपलब्ध हो पायीं। अख्बार और वेबसाइट्स पर लिखी जानेवाली अपनी बेबाक् टिप्पणियों के लिए भी वे खूब जाने जाते थे। उनकी अविचल सामाजिक प्रतिबद्धता, धर्मनिरपेक्ष-प्रगतिशील विश्वदृष्टि, और जनविरोधी राजनीति के ख़िलाफ़ उनका ग़ुस्सा उनके हर तरह के लेखन में बहुत मुखर है।

खरे जी ने अभी-अभी हिंदी अकादमी, दिल्ली के उपाध्यक्ष का पदभार सम्भाला था। उनके नेतृत्व में हिंदी अकादमी को एक नया जीवन मिलने की उम्मीद हिंदी के सभी गंभीर साहित्यकर्मियों को थी। ऐसे में उनका असमय निधन निश्चित रूप से एक बहुत बड़ी क्षति है।

जनवादी लेखक संघ उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

 


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